सीकर के खाटूश्याम जी मंदिर के कपाट 19 घंटे बंद रहे
अमावस्या पर बाबा श्याम का तिलक श्रृंगार होता है, मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना
राजस्थान के सीकर में स्थित खाटूश्याम जी मंदिर के कपाट 16 सितंबर रात 10 बजे बंद कर दिए गए थे और 17 सितंबर शाम 5 बजे संध्या आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए पुनः खोल दिए गए। यह बंदी बाबा श्याम के तिलक श्रृंगार की पारंपरिक धार्मिक प्रक्रिया के तहत लगभग 19 घंटे तक रही।
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सीकर। राजस्थान के सीकर जिले में स्थित खाटूश्याम जी मंदिर के कपाट 16 सितंबर रात 10 बजे बंद कर दिए गए थे। यह बंदी लगभग 19 घंटे तक रही और 17 सितंबर शाम 5 बजे संध्या आरती के बाद श्रद्धालुओं के लिए फिर से खोल दिए गए। मंदिर की यह परंपरा अमावस्या के पावन अवसर पर बाबा श्याम के तिलक श्रृंगार से जुड़ी है।
श्री श्याम मंदिर कमेटी के कोषाध्यक्ष रवि सिंह चौहान ने बताया कि इस धार्मिक प्रक्रिया में मंदिर के अधिकृत पुजारी ही शामिल होते हैं। महीने में कुछ विशेष दिन ऐसे होते हैं जब पुजारी बाबा श्याम के मूल शालिग्राम स्वरूप के दुर्लभ दर्शन करते हैं। इसके बाद विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ नया तिलक श्रृंगार किया जाता है, जिसमें लगभग 19 घंटे लगते हैं।
मंदिर कमेटी ने आधिकारिक सूचना जारी कर बताया था कि 16 सितंबर की रात 10 बजे शयन आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाएंगे और 17 सितंबर को पूरे दिन बंद रहेंगे। शाम 5 बजे संध्या आरती के समय कपाट पुनः श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
खाटूश्याम जी को देश-विदेश में ‘हारे का सहारा’ कहा जाता है और वे भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार माने जाते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, बाबा श्याम महाभारत काल के बर्बरीक हैं, जो भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र थे। महाभारत युद्ध के समय बर्बरीक कौरवों की ओर से युद्ध में भाग लेने जा रहे थे क्योंकि उन्होंने अपनी माता को हारे हुए पक्ष का साथ देने का वचन दिया था।
भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक की असीम शक्तियों को जानकर ब्राह्मण का वेश धरकर उनसे उनका शीश दान में मांग लिया। बर्बरीक ने बिना हिचकिचाहट शीश काटकर श्रीकृष्ण को समर्पित कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर श्रीकृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलयुग में वे ‘श्याम’ के नाम से पूजे जाएंगे और जो भी हताश होकर उनके पास आएगा, वे उसकी सबसे बड़ी सहायता करेंगे। यही कारण है कि करोड़ों श्रद्धालु उन्हें ‘हारे के सहारे’ के रूप में पूजते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- कपाट बंद रहने की धार्मिक महत्वता क्या है?
- यह परंपरा बाबा श्याम के तिलक श्रृंगार से जुड़ी है, जो आधिकारिक पुजारियों द्वारा संचालित की जाती है।
- तिलक श्रृंगार प्रक्रिया में कौन शामिल होता है?
- यह प्रक्रिया मंदिर के अधिकृत पुजारियों द्वारा विधि-विधान और मंत्रोच्चार के साथ की जाती है।
- बाबा श्याम का पौराणिक इतिहास क्या है?
- बाबा श्याम महाभारत के बर्बरीक थे, भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र, जिन्हें श्रीकृष्ण ने शीश दान में दिए थे।
- बाबा श्याम को क्यों 'हारे का सहारा' कहा जाता है?
- यह इसलिए क्योंकि वे कलयुग में श्याम के नाम से पूजे जाते हैं और हताश श्रद्धालुओं की सबसे बड़ी सहायता करते हैं।
- मंदिर ने कपाट बंद होने के बारे में कैसे सूचना दी?
- मंदिर कमेटी ने आधिकारिक सूचना जारी कर कपाट बंद होने और पुनः खुलने का समय बताया था।
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