राजस्थान हाईकोर्ट ने टारगेटेड केस निपटान के निर्देश वापस लिए
वकीलों के विरोध और बार संघों के समर्थन के बाद प्रशासन ने आदेश वापस लिया
राजस्थान हाईकोर्ट ने टारगेटेड केसों के निपटान के निर्देश वापस ले लिए हैं, जो वकीलों और बार संघों के विरोध के बाद हुआ। हाईकोर्ट रजिस्ट्रार ने सभी जिला और सत्र न्यायाधीशों को पत्र भेजकर इन आदेशों को वापस लेने की जानकारी दी।
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अजमेर। राजस्थान हाईकोर्ट ने 11 अगस्त 2026 को जारी टारगेटेड केसों के निपटान के निर्देश वापस ले लिए हैं। यह कदम वकीलों के विरोध और बार संघों के न्यायिक कामकाज के बहिष्कार के बाद प्रशासन ने उठाया।
हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार ने सभी जिला और सत्र न्यायाधीशों को पत्र भेजकर एक्शन प्लान फेज-VI के तहत टारगेटेड केसों से जुड़े आदेश वापस लेने की जानकारी दी। साथ ही निर्देशों को संबंधित न्यायिक अधिकारियों तक पहुंचाने को कहा गया।
राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन और लॉयर्स एसोसिएशन जोधपुर ने लगातार टारगेटेड केसों के निपटान के निर्देशों का विरोध किया था। वकीलों का कहना था कि मामलों के लिए तय लक्ष्य के दबाव में न्यायिक प्रक्रिया की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है और निपटान की संख्या बढ़ाने पर अधिक जोर दिया जाता है।
इस विरोध के चलते कई बार संघों ने न्यायिक कामकाज का बहिष्कार भी किया। राजस्थान हाईकोर्ट एडवोकेट्स एसोसिएशन के अध्यक्ष रणजीत जोशी और लॉयर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दिलीप सिंह उदावत ने निर्देश वापस लिए जाने को वकीलों की बड़ी जीत बताया।
जोधपुर की दोनों एसोसिएशन ने प्रदेश के बार संघों का समर्थन किया था, जिसका परिणाम अब सामने आया है।
जिला बार एसोसिएशन केकड़ी ने भी टारगेटेड केस पॉलिसी के विरोध में आपत्ति जताई। पदाधिकारियों और अधिवक्ताओं ने अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश प्रवीण कुमार वर्मा को ज्ञापन सौंपा।
बार एसोसिएशन अध्यक्ष सीताराम कुमावत के नेतृत्व में दिए गए ज्ञापन में कहा गया कि अधिवक्ता समुदाय पुराने लंबित प्रकरणों के त्वरित निस्तारण के पक्ष में है, लेकिन केवल संख्या का लक्ष्य पूरा करने के लिए प्रकरणों को टारगेटेड श्रेणी में रखकर निस्तारण का दबाव न्याय की गुणवत्ता पर असर डाल सकता है।
ज्ञापन में राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर के आदेश और परिपत्र का हवाला दिया गया और पांच वर्ष पुराने सामान्य प्रकरणों को टारगेटेड केस की श्रेणी से अलग रखने की मांग की गई। न्याय की गुणवत्ता, प्रभावी पैरवी का अवसर, पक्षकारों के अधिकार और न्यायहित को देखते हुए यह मांग उठाई गई है।
पॉलिसी के विरोध में बार एसोसिएशन के सभी सदस्य न्यायिक कार्य से विरत रहेंगे।
वकीलों का कहना है कि पर्याप्त समय मिलने पर ही पक्षकार अपने अधिवक्ता के माध्यम से तैयारी कर पाते हैं। बार एसोसिएशन ने स्पष्ट किया कि यह विरोध न्यायपालिका के खिलाफ नहीं है।
डॉ. अरुण कुमार ने कहा, "टारगेटेड केसों के विरोध में प्रदेश के ज्यादातर बार संघों ने न्यायिक कामकाज का बहिष्कार किया था।"
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- वकीलों का क्या तर्क था टारगेटेड केस पॉलिसी के खिलाफ?
- वकीलों का मानना था कि मामले जल्दी निपटाने के दबाव में न्याय की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।
- बार एसोसिएशन ने विरोध कैसे व्यक्त किया?
- बार एसोसिएशन ने टारगेटेड केस पॉलिसी के खिलाफ ज्ञापन सौंपा और न्यायिक कार्य का बहिष्कार किया।
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