संतान सप्तमी व्रत से संतान सुख की प्राचीन कथा
राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी ने संतान सप्तमी व्रत से पाया संतान सुख
संतान सप्तमी व्रत की प्राचीन कथा में बताया गया है कि इस व्रत के पालन से पुत्र और पौत्र की प्राप्ति होती है। राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी ने इसे अनियमित रूप से किया, जबकि उनकी मित्र ब्राह्मणी ने नियमपूर्वक व्रत रखा, जिसके फलस्वरूप उन्हें संतान सुख मिला। इस कथा से व्रत के महत्व और विधि का ज्ञान होता है।
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महाराज युधिष्ठिर ने भगवान से पूछा कि कौन सा व्रत मनुष्य के दुख दूर कर पुत्र और पौत्र प्रदान करता है। इस पर लोमष ऋषि ने राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी के संतान सप्तमी व्रत की कथा सुनाई, जिससे संतान सुख प्राप्त हुआ।
लोमष ऋषि ब्रजराज की मथुरापुरी में वसुदेव देवकी के घर गए। देवकी ने उनसे राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी का संतान सप्तमी व्रत विस्तार से जानना चाहा। राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी अत्यंत सुंदर थीं और उनके नगर में विष्णु गुप्त नामक ब्राह्मण रहते थे। एक बार चंद्रमुखी और एक ब्राह्मणी सरयू नदी में स्नान करने गईं, जहां उन्होंने स्त्रियों को संतान सप्तमी व्रत करते देखा। उन्होंने भी इस व्रत को करने का संकल्प लिया।
ब्राह्मणी भद्रमुखी ने व्रत नियमपूर्वक किया, जबकि रानी चंद्रमुखी राजपद के कारण कभी-कभी ही करती रहीं। दोनों की मृत्यु के बाद दूसरे जन्म में रानी बंदरिया और ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में जन्मीं। ब्राह्मणी ने भगवान शंकर और पार्वती का ध्यान किया, जबकि रानी ने सब कुछ भुला दिया।
ब्राह्मणी ने कन्या के रूप में जन्म लिया, जिसका नाम भूषण देवी रखा गया। उन्होंने आठ सुंदर, धर्मवीर और कर्मनिष्ठ पुत्रों को जन्म दिया। दूसरी ओर, रानी के गर्भ से कोई पुत्र नहीं हुआ और वह दुखी रहीं। वृद्धावस्था में रानी का पुत्र जन्मा, जो नौ वर्ष की आयु में मृत्यु को प्राप्त हुआ।
रानी पुत्र शोक से व्याकुल हो गईं। भूषण देवी ने अपने पुत्रों को रानी के पास भेजा। रानी ने पाप के वशीभूत होकर विष मिलाकर लड्डू खिलाए, लेकिन भगवान शंकर की कृपा से कोई बालक नहीं मरा। आश्चर्यचकित रानी ने भूषण देवी से इसका रहस्य पूछा। भूषण देवी ने तीन जन्मों की कथा सुनाई, जिसमें बताया कि पहले जन्म में वे राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी थीं और ब्राह्मणी भद्रमुखी उनकी मित्र थीं। उन्होंने संतान सप्तमी व्रत नियमपूर्वक किया, जिससे उन्हें संतान सुख मिला।
दूसरे जन्म में रानी बंदरिया बनीं और ब्राह्मणी मुर्गी की योनि में जन्मीं। इस कथा से संतान सप्तमी व्रत के महत्व और विधि का पता चलता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- चंद्रमुखी और ब्राह्मणी के दूसरे जन्म में क्या हुआ?
- वे रानी बंदरिया और ब्राह्मणी मुर्गी के रूप में जन्मीं, जहां ब्राह्मणी ने भगवान शंकर और पार्वती की पूजा की।
- रानी ने अपने पुत्र को किस प्रकार की त्रासदी का सामना करना पड़ा?
- रानी के पुत्र की उम्र केवल नौ वर्ष थी, जिसके बाद उसकी मृत्यु हो गई।
- क्या रानी ने पुत्रों को मारने की कोशिश की थी?
- हाँ, रानी ने विष मिलाकर लड्डू खिलाए, लेकिन भगवान शंकर की कृपा से कोई बालक नहीं मरा।
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