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बीकानेर में सोमवार को साफ होगी नगर निगम की तस्वीर

ट्रिपल इंजन सरकार, कांग्रेस या त्रिशंकु बोर्ड में से कोई भी बन सकता है

बीकानेर में सोमवार को नगर निगम के 80 पार्षदों की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इससे तय होगा कि ट्रिपल इंजन की सरकार बनेगी, कांग्रेस काबिज होगी या निर्दलीयों के हाथ में चाबी रहेगी। दो साल के प्रशासक काल के बाद जनप्रतिनिधियों का हस्तक्षेप निगम में बदलाव लाएगा।
AI सार

बीकानेर नगर निगम के 80 पार्षदों की स्थिति सोमवार को स्पष्ट होगी, जिससे मेयर और सरकार का गठन तय होगा। दो साल के प्रशासक काल के बाद पार्षद निगम में वापसी करेंगे, जिससे वित्तीय और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना होगा। परिणाम आने के बाद पार्षदों की सुरक्षा के लिए विशेष इंतजाम किए जाएंगे।

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बीकानेर नगर निगम चुनाव की तैयारी
बीकानेर नगर निगम चुनाव की तैयारी / सोशल मीडिया

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 बीकानेर में सोमवार को नगर निगम के 80 पार्षदों की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। इससे तय होगा कि ट्रिपल इंजन की सरकार बनेगी, कांग्रेस काबिज होगी या निर्दलीयों के हाथ में चाबी रहेगी। दो साल के प्रशासक काल के बाद जनप्रतिनिधियों का हस्तक्षेप निगम में बदलाव लाएगा।

नगर निगम में दो साल से प्रशासक काल के दौरान वार्डों की असली स्थिति अधिकारियों तक नहीं पहुंची। वहां ऐसे निर्णय लिए गए जिनमें अधिकारियों और कर्मचारियों का हित जुड़ा था। अधिकारियों ने जहां मनमाने तरीके से टेंडर दिए, उनमें कई बार कोर्ट से रोक लगने के बाद भी वे नहीं माने। उदाहरण के तौर पर ट्रांसफॉर्मर के टेंडर को दो बार कोर्ट से स्टे मिला, लेकिन अधिकारियों ने जिद्द जारी रखी।

अब पार्षदों के आने से हालात बदलेंगे। मेयर बनने वाले के सामने वित्तीय और राजनीतिक चुनौतियां होंगी। सोमवार दोपहर 12 बजे तक स्थिति साफ होते ही गुप्त राजनीति शुरू हो जाएगी। यदि किसी दल को स्पष्ट बहुमत (41 से अधिक सीटें) मिलता है तो निर्दलीयों की मांग कम होगी, लेकिन 30 से 32 सीटों पर बहुमत सिमटने पर निर्दलीयों को महंगी कीमत चुकानी होगी। दोनों दल संपर्क में हैं, लेकिन रेट तय नहीं हो पा रहे।

परिणाम आने के बाद जीते हुए पार्षदों को कड़ी सुरक्षा और गोपनीय ठिकानों पर रखा जाएगा। चर्चा है कि भाजपा ने अपने पार्षदों के लिए हरियाणा में जगह बुक कराई है, जबकि कांग्रेस के लोग प्रदेश से बाहर कर्नाटक की ओर जा सकते हैं।

शहर में चल रही पांच सिटी बसों से रोजाना 12,500 रुपए का घाटा हो रहा है। पार्षद न होने के कारण अधिकारियों ने 30-30 लाख रुपए तक के मनमाने एआरसी टेंडर किए। पूर्व-पश्चिम विस क्षेत्र के लिए 90 करोड़ रुपए का टिपर-ट्रैक्टर टेंडर हुआ है। ठेकेदारों के 7-8 करोड़ रुपए, करोड़ों के बिजली बिल और अमृत-2 योजना की 20% हिस्सेदारी के लिए लोन लेना पड़ा है।

सरकारी अभियानों और शिविरों के टेंट-व्यवस्था का पूरा खर्च निगम उठाता है, लेकिन इसका सरकार से कोई भुगतान नहीं मिलता और काम एक ही फर्म को दिया जाता है। पार्षदों को 5,000 रुपए प्रति माह और मेयर को 20,000 रुपए मानदेय मिलता है।

दो साल के प्रशासक काल के बाद अब निगम में पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण होगी और वित्तीय व राजनीतिक दबावों का सामना करना पड़ेगा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

नगर निगम में प्रशासक काल के दौरान क्या समस्याएं आईं?
प्रशासक काल में टेंडर मनमाने ढंग से दिये गए और कोर्ट के आदेशों की अनदेखी हुई।
पार्षदों के आने से निगम में क्या बदलाव अपेक्षित हैं?
पार्षदों के आने से निगम में राजनीतिक और वित्तीय निर्णयों में पारदर्शिता और बदलाव आएंगे।
चुनाव के बाद पार्षदों को सुरक्षा क्यों दी जाएगी?
जीते हुए पार्षदों को संभावित खतरों से बचाने और उनकी सुरक्षा के लिए गोपनीय ठिकानों पर रखा जाएगा।
नगर निगम में वित्तीय घाटे का क्या कारण है?
सिटी बसों के घाटे, मनमाने टेंडर, बढ़े हुए बिजली बिल और अमृत-2 योजना के लिए लोन लेना वित्तीय घाटे के मुख्य कारण हैं।

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Published14 सितंबर 2026, 11:32 IST IST
Last updated14 सितंबर 2026, 11:32 IST IST
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