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केंद्र सरकार लद्दाख के लिए सुई जेनरिस मॉडल पर काम कर रही है

लद्दाख को न राज्य न केंद्र शासित प्रदेश, मिलेगा निर्वाचित निकाय के साथ नया ढांचा

केंद्र सरकार लद्दाख के लिए एक नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार कर रही है, जिसमें न तो उसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा और न ही विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा। इस व्यवस्था में एक निर्वाचित निकाय होगा, जिसके पास विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार होंगे, लेकिन वह विधानसभा नहीं होगा।
AI सार

केंद्र सरकार लद्दाख के लिए एक नया संवैधानिक मॉडल तैयार कर रही है, जिसमें राज्य का दर्जा नहीं मिलेगा लेकिन एक निर्वाचित निकाय को विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार दिए जाएंगे। इस "सुई जेनरिस" मॉडल में विधानसभा नहीं होगी और स्थानीय नेताओं को निकाय के अधिकारों के बंटवारे पर चर्चा कर रही है सरकार। अभी इस व्यवस्था का अंतिम रूप नहीं तय हुआ है और बातचीत जारी है।

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लद्दाख की संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा
लद्दाख की संवैधानिक व्यवस्था पर चर्चा / सोशल मीडिया

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केंद्र सरकार लद्दाख के लिए एक नई संवैधानिक व्यवस्था तैयार कर रही है, जिसमें न तो उसे पूर्ण राज्य का दर्जा मिलेगा और न ही विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश बनाया जाएगा। इस व्यवस्था में एक निर्वाचित निकाय होगा, जिसके पास विधायी, कार्यकारी और वित्तीय अधिकार होंगे, लेकिन वह विधानसभा नहीं होगा।

लद्दाख 2019 से पहले जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था। अगस्त 2019 में केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 के तहत मिला विशेष दर्जा खत्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का फैसला किया था। शुरुआत में लद्दाख के लोगों ने इस फैसले का स्वागत किया, लेकिन बाद में स्थानीय स्तर पर नौकरशाही और उपराज्यपाल के हाथों प्रशासन की ताकत बढ़ने की चिंता बढ़ी।

स्थानीय संगठन लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस ने राजनीतिक और संवैधानिक भागीदारी बढ़ाने की मांग की। लद्दाख के नेताओं की मुख्य मांगों में राज्य का दर्जा, संविधान के तहत सुरक्षा, जमीन और रोजगार की सुरक्षा तथा स्थानीय प्रतिनिधित्व बढ़ाना शामिल है।

केंद्र सरकार की योजना में लद्दाख के लिए ऐसा मॉडल शामिल है जो पहले से मौजूद किसी व्यवस्था की नकल न हो, बल्कि खास परिस्थिति के अनुसार तैयार किया जाए। इस मॉडल में एक निर्वाचित मंडल होगा, जिसके सदस्यों का चुनाव सीधे निर्वाचन क्षेत्रों से होगा। यह निकाय स्थानीय स्तर के कई महत्वपूर्ण फैसलों में भूमिका निभाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस निकाय को कितनी ताकत मिलेगी, खासकर जमीन और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में। प्रशासनिक अधिकारियों पर इसका कितना नियंत्रण होगा, इस पर अभी स्पष्टता नहीं है। सरकार और लद्दाख के प्रतिनिधियों के बीच इन मुद्दों पर बातचीत जारी है।

9 सितंबर को हुई बैठक में प्रस्तावित व्यवस्था के ढांचे पर चर्चा हुई और सीधे निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव कराने पर सहमति बनी। लद्दाखी नेताओं को अधिकारों के बंटवारे को स्पष्ट करने के लिए आठ-नौ सवालों की सूची भी दी गई है।

यह व्यवस्था न तो राज्य की विधानसभा जैसी होगी और न ही वर्तमान केंद्र शासित प्रदेशों की विधायिका जैसी। सुई जेनरिस मॉडल इन दोनों के बीच एक नई व्यवस्था बनाने की कोशिश है, जिसमें जनता द्वारा चुना हुआ निकाय होगा और उसे महत्वपूर्ण अधिकार दिए जाएंगे।

अगर निकाय को केवल सलाह देने की भूमिका मिली तो स्थानीय नेताओं की नाराजगी खत्म नहीं होगी, लेकिन वास्तविक विधायी, प्रशासनिक और वित्तीय अधिकार मिलने पर यह मौजूदा व्यवस्था में बड़ा बदलाव होगा। खासकर जमीन, स्थानीय विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और बजट जैसे मामलों में स्थानीय प्रतिनिधियों की भूमिका बढ़ेगी।

हालांकि, यह कहना जल्दबाजी होगी कि लद्दाख की सारी समस्याएं इस मॉडल से खत्म हो जाएंगी, क्योंकि इसका अंतिम ढांचा अभी तैयार नहीं हुआ है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

लद्दाख का विशेष दर्जा कब खत्म हुआ?
अगस्त 2019 में अनुच्छेद 370 के तहत लद्दाख का विशेष दर्जा खत्म किया गया था।
स्थानीय प्रतिनिधियों की भूमिका इस नए मॉडल में कैसी होगी?
स्थानीय प्रतिनिधियों को जमीन, विकास, रोजगार, इंफ्रास्ट्रक्चर और बजट में अधिक भूमिका मिलने की संभावना है।
नए मॉडल में प्रशासनिक अधिकारियों का नियंत्रण कितना होगा?
प्रशासनिक अधिकारियों पर निकाय के नियंत्रण के संबंध में अभी स्पष्टता नहीं है और बातचीत जारी है।
क्या यह नया मॉडल लद्दाख की सभी समस्याओं का समाधान करेगा?
नहीं, क्योंकि अंतिम ढांचा अभी तैयार नहीं हुआ है और समस्याओं के पूर्ण समाधान में समय लगेगा।

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Published11 सितंबर 2026, 16:36 IST IST
Last updated11 सितंबर 2026, 16:36 IST IST
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