धौलपुर में देव छठ मेला, हजारों श्रद्धालुओं ने लगाई डुबकी
मचकुंड सरोवर पर आस्था का अद्भुत संगम, कालयवन से जुड़ी प्राचीन कथा
राजस्थान के धौलपुर में पवित्र तीर्थराज मचकुंड पर देव छठ मेला आयोजित किया गया, जिसमें हजारों श्रद्धालुओं ने पवित्र जल में स्नान कर परिवार की सुख-शांति की कामना की। यह मेला द्वापर युग की प्राचीन कथा से जुड़ा है और राजस्थान सहित उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के भक्तों को आकर्षित करता है। मेले में सामाजिक सद्भाव, भाईचारा और कौमी एकता का भी संदेश दिया जाता है।
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धौलपुर। राजस्थान के धौलपुर जिले में देव छठ मेला पवित्र तीर्थराज मचकुंड पर आयोजित हुआ। हजारों श्रद्धालु मचकुंड सरोवर के घाटों पर आस्था और भक्ति के साथ डुबकी लगाते हुए परिवार की सुख-शांति की कामना करते हैं। यह मेला हजारों साल पुरानी धार्मिक मान्यताओं को जीवंत रखता है।
धौलपुर का देव छठ मेला केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, लोक संस्कृति और सामाजिक सद्भाव का प्रतीक है। इतिहासकार अरविंद शर्मा के अनुसार, यह मेला स्थानीय स्तर से परे राजस्थान के विभिन्न जिलों के साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली से भी भक्तों को आकर्षित करता है। श्रद्धालु महाराज मचकुंड के दर्शन कर परिवार की मंगलकामना करते हैं।
इस मेले का संबंध द्वापर युग की एक प्राचीन कथा से है जिसमें भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया था। कंस के ससुर जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण के लिए कालयवन नामक शक्तिशाली राक्षस की मदद ली थी। श्रीकृष्ण ने कालयवन को मचकुंड तक लाकर महाराज मचकुंड की पीतांबरी उनके ऊपर डाल दी। कालयवन ने महाराज मचकुंड को श्रीकृष्ण समझकर पीतांबरी खींच ली, जिससे महाराज की क्रोधाग्नि से कालयवन जलकर भस्म हो गया।
कथाओं के अनुसार, महाराज मचकुंड ने इस पवित्र स्थान पर एक विशाल यज्ञ करवाया था जिसमें भगवान श्रीकृष्ण भी शामिल हुए थे। इस यज्ञ में पूरे भारत के 68 प्रमुख तीर्थस्थलों का पवित्र जल लाया गया था। तब से देव छठ मेले की परंपरा चली आ रही है।
मचकुंड में साधु-संत और श्रद्धालु पवित्र जल में स्नान कर आरती करते हैं और अपने घरों की मंगलकामना करते हैं। धौलपुर रियासत के समय से इस मेले को राजशाही संरक्षण प्राप्त रहा है। राजा-महाराजा इसे भव्य रूप से मनाते थे और यह धार्मिक आस्था के साथ व्यापार का भी बड़ा केंद्र था।
आज भी यह मेला समाज के हर वर्ग और समुदाय के लोगों को जोड़ता है और भाईचारे, कौमी एकता तथा सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है। नवविवाहित जोड़े इस मेले में विशेष रूप से शामिल होते हैं। सीमावर्ती मध्य प्रदेश से बड़ी संख्या में नए जोड़े परिवार सहित तीर्थराज मचकुंड पहुंचते हैं। वे आटा और हल्दी मिलाकर पूजा करते हैं और शादी की मोहरी, कलंगी, सेहरा सहित विवाह सामग्री को पवित्र जल में विसर्जित करते हैं। आसपास की महिलाएं मंगल गीत गाकर नए जोड़े के सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।
धौलपुर का देव छठ मेला धार्मिक आस्था, लोक परंपराओं, सामाजिक समरसता और इतिहास का जीवंत संगम है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- देव छठ मेले का धार्मिक और सामाजिक महत्व क्या है?
- यह मेला धार्मिक आस्था के साथ-साथ समाज में भाईचारे, कौमी एकता और सामाजिक सद्भाव का संदेश देता है।
- नवविवाहित जोड़े मेले में कैसे शामिल होते हैं?
- नवविवाहित जोड़े आटा-हल्दी मिलाकर पूजा करते हैं और विवाह से जुड़ी सामग्री को पवित्र जल में विसर्जित करते हैं।
- मचकुंड में श्रद्धालु क्या कार्य करते हैं?
- श्रद्धालु पवित्र जल में स्नान कर आरती करते हैं और परिवार की मंगलकामना करते हैं।
- देव छठ मेले की प्राचीन कथा क्या है?
- भगवान श्रीकृष्ण ने कंस के ससुर जरासंध द्वारा भेजे राक्षस कालयवन को मचकुंड पर महाराज मचकुंड की पीतांबरी के द्वारा जलाया था।
- मेले में किन-किन राज्यों से श्रद्धालु आते हैं?
- राजस्थान के साथ उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली से भी श्रद्धालु इस मेले में शामिल होते हैं।
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