उदयपुर में बांस शिल्प से जुड़ी 70 से 80 परिवारों की आजीविका
पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा में बांस से घरेलू उपयोग के कई उत्पाद बनाए जाते हैं
उदयपुर में करीब 70 से 80 परिवार बांस शिल्प के कार्य में लगे हुए हैं, जो वर्षों से चली आ रही परंपरा है। राजस्थान सरकार के राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत बांस की खेती, कारीगरों के प्रशिक्षण और उत्पादों के बाजार विस्तार पर काम किया जा रहा है। इस शिल्प से बने उत्पादों की बिक्री राजस्थान के कई जिलों तक होती है और यह क्षेत्रीय आजीविका का एक स्रोत है।
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उदयपुर। उदयपुर में करीब 70 से 80 परिवार बांस शिल्प के काम में लगे हुए हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका है। बांस की पतली पट्टियों को हाथों से बुनकर टोकरी, पेन स्टैंड, फूलदान जैसे घरेलू उपयोग के उत्पाद बनाए जाते हैं।
कारीगर पहले बांस का चयन कर उसे काटते और छीलकर पतली पट्टियों में तैयार करते हैं। इसके बाद इन पट्टियों को आकार देकर मेहनत और बारीकी से उत्पाद बनाए जाते हैं। पुष्पा बाई ने बताया, "जब वह 10 साल की थीं, तब उनके माता-पिता ने उन्हें यह काम सिखाया था।" उनके अनुसार उदयपुर में यह काम करने वाले परिवारों की संख्या करीब 70 से 80 है।
बांस से बनने वाले उत्पादों में पेन स्टैंड, छोटी टोकरी, कोस्टर, चाबी रखने का स्टैंड, फूलदान और ट्रे शामिल हैं। पुष्पा ने बताया कि उनके बनाए सामान भीलवाड़ा, जयपुर, अजमेर, कोटा और बांसवाड़ा तक पहुंचते हैं। कारीगर चंदा ने कहा कि बाजार में प्लास्टिक और धातु के आधुनिक सजावटी सामान बढ़ने के बावजूद बांस से बने पारंपरिक उत्पादों की उपयोगिता खत्म नहीं हुई है।
मंजू ने बताया, "यह परंपरा लगातार चलती आ रही है, लेकिन मुनाफा कम है।" उन्होंने कहा कि उनके परिवार में यह काम परंपरा के अनुसार आगे बढ़ रहा है। बांस से एक वस्तु तैयार करने में कारीगर को करीब एक से दो दिन लगते हैं। उत्पाद की बिक्री कीमत उसकी डिजाइन, आकार और कारीगरी पर निर्भर करती है।
कारीगर पुष्पेंद्र ने बताया कि असम से राजस्थान तक बांस मंगाने की लागत दूरी, परिवहन, गुणवत्ता और स्थानीय बाजार भाव पर निर्भर करती है। असम से आने पर बांस की कीमत प्रति नग करीब 300 रुपए होती है।
राजस्थान सरकार के तहत राष्ट्रीय बांस मिशन के जरिए बांस की खेती, नर्सरी विकास, कारीगरों के प्रशिक्षण और उत्पादों के बाजार विस्तार पर जोर दिया जा रहा है। डॉ हीरासिंह राठौड़ ने बताया, "प्रति हेक्टेयर बांस की खेती की निर्धारित लागत 1 लाख 20 हजार रुपए है, जिस पर किसान को 60 हजार रुपए का अनुदान दिया जाएगा।"
उदयपुर जिले में इस योजना के तहत 25 हेक्टेयर भूमि पर बांस रोपण का लक्ष्य रखा गया है। कृषि विज्ञान केंद्रों और उद्यान विभाग के जरिए किसानों को आधुनिक तकनीक और बाजार से जुड़ने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है।
बांस शिल्प उदयपुर के कई परिवारों के लिए केवल रोजगार नहीं, बल्कि पहचान और विरासत का हिस्सा है। आने वाली पीढ़ी के बेटा-बेटी भी इसी काम से जुड़े हुए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- बांस शिल्प में इस्तेमाल होने वाला बांस कैसे तैयार किया जाता है?
- कारीगर बांस का चयन करके उसे काटते और छीलकर पतली पट्टियों में बदलते हैं, जिससे उत्पाद बनाया जाता है।
- बांस शिल्प के उत्पाद किन क्षेत्रों में बेचे जाते हैं?
- उदयपुर के कारीगर अपने उत्पाद भीलवाड़ा, जयपुर, अजमेर, कोटा और बांसवाड़ा तक भेजते हैं।
- बांस शिल्प के क्षेत्र में मुनाफे की स्थिति क्या है?
- मुनाफा कम होने के बावजूद यह परंपरा परिवारों में जारी है।
- राष्ट्रीय बांस मिशन के तहत किसानों को क्या सुविधाएं मिलती हैं?
- किसानों को बांस की खेती की लागत में अनुदान दिया जाता है और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है।
- उदयपुर में बांस शिल्प की आने वाली पीढ़ी का क्या स्थिति है?
- पीढ़ियां इस काम में जुड़ी हैं और बेटा-बेटी भी इसके साथ काम कर रहे हैं।
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