जमुई की छह नदियों पर जंगली कांसिया घास का कब्जा, 1300 एकड़ खेती चौपट
कांसिया घास की गहरी जड़ें भूजल स्तर गिरा रही हैं, किसानों को लाखों का नुकसान
जमुई जिले की छह नदियों के किनारे 1300 एकड़ से अधिक क्षेत्र में जंगली कांसिया घास ने कब्जा कर लिया है, जिससे खेती प्रभावित हुई है और किसानों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। इस घास की गहरी जड़ें जलस्रोत को कम कर रही हैं और नदी के जल प्रवाह को बाधित कर बाढ़ व कटाव का खतरा बढ़ा रही हैं। किसान प्रशासन से समाधान की मांग कर रहे हैं।
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जमुई जिले की छह नदियों के किनारे 1300 एकड़ से अधिक क्षेत्र में जंगली कांसिया घास ने कब्जा कर लिया है। इसकी छह मीटर तक गहरी जड़ें भूजल स्तर को तेजी से गिरा रही हैं, जिससे खेती चौपट हो गई है और किसानों को भारी आर्थिक नुकसान हो रहा है।
जमुई की प्रमुख नदियां किऊल, बरनार, सुखनर, उलई, आंजन और गढ़वा सहित सभी छोटी-बड़ी नदियां कांसिया घास की चपेट में हैं। विभागीय और स्थानीय अनुमान के अनुसार अकेले किऊल नदी में 400 एकड़ और बरनार नदी में 200 एकड़ सहित जिले भर में लगभग 1300 एकड़ से अधिक नदी पाट पर इस खरपतवार ने अपना साम्राज्य स्थापित कर लिया है।
डॉ. सुधीर कुमार ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रों और वनस्पति विज्ञान के अनुसार सैकेरम स्पॉन्टेनियम की जड़ें बेहद खास और मजबूत होती हैं, जिन्हें 'रोप रूट्स' यानी रस्सी जैसी जड़ें कहा जाता है। ये जड़ें जमीन में लंबवत छह मीटर या उससे भी अधिक गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं। गहरी मिट्टी में मौजूद जल और नाइट्रेट को खींचने की इसकी क्षमता अन्य सामान्य पौधों से कई गुना अधिक है।
इस घास का सबसे खतरनाक असर यह है कि यह नदी के आंतरिक जलस्रोतों को तेजी से सोख रही है, जिससे आसपास के कुएं, चापाकल और बोरिंग सूख रहे हैं। नदी तल में इसके घने गुच्छों के जमाव से प्राकृतिक जलप्रवाह संकीर्ण हो रहा है, जिससे बरसात के दिनों में अचानक बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ गया है।
कांसिया घास की वजह से नदी कछार की खेती पूरी तरह चौपट हो गई है। जिस जमीन पर यह घास उगती है, वहां कोई दूसरी वनस्पति नहीं पनप पाती। इसके कारण पीढ़ियों से होने वाली दलहन जैसे अरहर, कुरथी, सब्जी, बादाम, तरबूज और खीरा-ककड़ी की खेती ठप हो गई है। नदी किनारे उगने वाली सामान्य हरी घास, जो मवेशियों के चारे का मुख्य आधार थी, पूरी तरह विलुप्त हो गई है।
कांसिया घास इतनी कठोर होती है कि इसे न तो पशु खाते हैं और न ही इससे खाद या बेहतर ईंधन बनता है। स्थानीय किसान बताते हैं कि किऊल नदी किनारे उनकी डेढ़ सौ एकड़ से अधिक उपजाऊ भूमि है, जहां वे मूंगफली, धान, कुरथी, अरहर, तरबूज और खीरे की बंपर फसल लेते थे। इस बार कांसिया घास के फैलाव के कारण एक इंच भी बुआई नहीं हो सकी और सारे खेत बंजर पड़े हैं।
किसान परिवारों को दो से ढाई लाख रुपये तक का सीधा नुकसान हुआ है। प्रभावित किसानों का कहना है कि यदि प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो रोजी-रोटी के अभाव में परिवार का पेट भरने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- कांसिया घास की जड़ें क्यों खतरनाक हैं?
- इसकी जड़ें बहुत गहरी होती हैं और पूरी मिट्टी से जल तथा नाइट्रेट निकालती हैं, जिससे भूजल स्तर तेजी से गिरता है।
- कांसिया घास के कारण किसानों को क्या नुकसान हो रहा है?
- किसानों की खेती पूरी तरह चौपट हो गई है और उन्हे दो से ढाई लाख रुपये तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है।
- क्या कांसिया घास पशुओं द्वारा खाई जा सकती है?
- नहीं, यह घास इतनी कठोर है कि न तो पशु इसे खाते हैं और न ही इसे खाद या ईंधन के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
- असार में कांसिया घास के फैलाव से क्या खतरे हैं?
- इससे नदी के जल प्रवाह में कमी आती है, जिससे बाढ़ और कटाव का खतरा बढ़ जाता है।
- किसानों की भविष्य की चिंता क्या है?
- यदि प्रशासन ने कदम नहीं उठाए, तो किसानों को पलायन करना पड़ सकता है क्योंकि उनकी रोजी-रोटी खतरे में है।
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