बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा- मृत सफाई कर्मचारियों को 30 लाख मुआवजा मिले
अदालत ने जाति व्यवस्था को सामाजिक कलंक बताया और राज्य सरकार को मुआवजा देने का निर्देश दिया
बॉम्बे हाई कोर्ट ने खतरनाक सफाई कार्य के दौरान मृत कर्मचारियों के आश्रितों को राज्य सरकार 30 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने कहा कि मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी संस्थाओं पर नहीं डाली जा सकती और सरकार छह महीने में मृतकों की पहचान करे। अदालत ने इस मामले में जाति आधारित भेदभाव को रोकने और समानता सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया है।
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चांद छू लिया। बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि भारत चंद्रमा तक पहुंच गया है, लेकिन जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक अब भी कायम है। अदालत ने खतरनाक सफाई कार्य के दौरान मारे गए मृतक कर्मचारियों के आश्रितों को राज्य सरकार 30 लाख रुपए मुआवजा देने का आदेश दिया है।
हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की उस नीति को रद्द करते हुए कहा कि मुआवजा देने की जिम्मेदारी निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं पर नहीं डाली जा सकती। न्यायाधीश भारती डांगरे और मंजुषा देशपांडे की खंडपीठ ने राज्य सरकार को छह महीने के भीतर खतरनाक सफाई कार्य के दौरान मृत हुए सभी कर्मचारियों की पहचान करने का निर्देश दिया है।
अदालत ने बताया कि यह कार्य मैनुअल स्कैवेंजर्स के तौर पर रोजगार पर रोक और उनके पुनर्वास अधिनियम, 2013 की धारा 2(डी) के तहत परिभाषित है। अदालत ने कहा कि संविधान सभी नागरिकों को कानून के समक्ष समानता की गारंटी देता है, लेकिन 75 साल बाद भी देश उस सामाजिक बुराई से मुक्त नहीं हो पाया है जिसने सदियों से समाज को प्रभावित किया है।
उच्च न्यायालय ने कहा कि मैला ढोना एक ऐसी प्रथा है जो एक खास समुदाय के लोगों को पीढ़ियों से इस अमानवीय काम के लिए मजबूर करती रही है, जबकि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों और कानूनों ने इस पर रोक लगाई है। अदालत ने स्पष्ट किया कि सरकार जिम्मेदार निजी संस्थाओं या नियोक्ताओं से मुआवजा राशि वसूल सकती है।
याचिकाकर्ताओं ने बताया कि रिकॉर्ड के उलट राज्य ने 81 मामलों में 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया है, जबकि अदालत ने 30 लाख रुपये देने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि ऐसे प्रत्येक मृतक के आश्रितों को 30 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाए।
हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि 2013 के कानून में खतरनाक सफाई करने वाले कर्मचारियों के लिए सरकारी या निजी नियोक्ता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया गया है। संविधान हर नागरिक को कानून की नजर में बराबरी का अधिकार देता है।
अदालत ने कहा, '21वीं सदी में हम चंद्रमा के दूसरे हिस्से तक पहुंचने का दावा करते हैं, लेकिन हमारे सामने कड़वी सच्चाई यह है कि जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक अब भी मौजूद है, जो कुछ नागरिकों को मानवीय गरिमा से नीचे के काम करने के लिए मजबूर करता है।'
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- 2013 के पुनर्वास अधिनियम में क्या प्रावधान है?
- यह अधिनियम खतरनाक सफाई कार्य करने वाले कर्मचारियों को परिभाषित करता है और सरकारी या निजी नियोक्ताओं के आधार पर भेदभाव नहीं करता।
- हाई कोर्ट ने जाति व्यवस्था के बारे में क्या कहा?
- अदालत ने कहा कि जाति व्यवस्था का सामाजिक कलंक आज भी मौजूद है जो कुछ नागरिकों को अमानवीय कामों के लिए मजबूर करता है।
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