चंद्रशेखरन की वापसी से टाटा संस में कॉरपोरेट प्रशासन पर सवाल
टाटा ट्रस्ट्स और बोर्ड के अधिकारों को लेकर समूह में मतभेद उभरे
टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को फिर से कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त किया है और कंपनी की सूचीबद्धता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। इस निर्णय से टाटा समूह के कॉरपोरेट प्रशासन और शक्ति संतुलन को लेकर सवाल उठे हैं, जबकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस नियुक्ति का विरोध किया है।
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टाटा संस के बोर्ड ने चंद्रशेखरन को दोबारा कार्यकारी चेयरमैन नियुक्त किया है और कंपनी की शेयर बाजार में अनिवार्य सूचीबद्धता की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का फैसला लिया है। इस फैसले ने समूह के संचालन ढांचे और शक्ति संतुलन पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अगस्त में जब बोर्ड में चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति पर सहमति नहीं बन पाई थी, तब उन्होंने अगले कार्यकाल के लिए खुद को अलग कर लिया था। अब गुरुवार को आए बोर्ड के फैसले से लंबे समय से चली आ रही अनिश्चितता खत्म हुई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निर्णय नियामकों और बाजार के प्रति जवाबदेही बढ़ाएगा।
आईसीएआई के पूर्व सचिव अशोक हल्दिया ने कहा, ‘टाटा जैसे वैश्विक कारोबारी समूह के लिए लंबे समय तक असमंजस की स्थिति ठीक नहीं है। जब कोई फैसला निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से लिया जाता है तब यह सभी पक्षों के लिए फायदेमंद होता है। बोर्डरूम में प्रबंधन के प्रस्तावों पर खुली बहस और स्वस्थ चर्चा होना अच्छे कॉरपोरेट प्रशासन की बुनियाद है। उम्मीद है कि यह मामला बिना किसी गतिरोध के आसानी से सुलझा होगा।’
हल्दिया ने बताया कि सूचीबद्धता के बाद कंपनी के आंतरिक नियमों के तहत टाटा ट्रस्ट के नामित निदेशकों को मिले कई वीटो अधिकार कम या खत्म हो जाएंगे। इसके बावजूद टाटा संस के बोर्ड को टाटा ट्रस्ट और समूह की विरासत का सम्मान करना चाहिए।
हालांकि, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का विरोध किया है। उनका तर्क है कि यह फैसला चंद्रशेखरन के हटने के अपने फैसले और ट्रस्ट्स की मंजूरी के खिलाफ है। उनके इस रुख से समूह के बोर्ड के भीतर मतभेद खुलकर सामने आए हैं।
कॉर्पोरेट प्रोफेशनल अंकित सिंघी ने कहा, ‘चेयरमैन की नियुक्ति जैसा अहम फैसला आम सहमति से होना चाहिए था। चंद्रशेखरन के पहले पद छोड़ने के पीछे जरूर कोई ठोस वजह रही होगी। किसी भी कंपनी, खासकर टाटा जैसे विशाल समूह को चलाने के लिए प्रवर्तक का भरोसा होना बेहद जरूरी है।’
टाटा ट्रस्ट्स की टाटा संस में 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन उनका प्रभाव केवल हिस्सेदारी तक सीमित नहीं है। कंपनी के आंतरिक नियमों के अनुसार दो मुख्य ट्रस्ट, सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट, जब तक संयुक्त रूप से कंपनी की साधारण शेयर पूंजी का कम से कम 40 प्रतिशत रखते हैं, वे बोर्ड के एक-तिहाई निदेशकों को संयुक्त रूप से नामित कर सकते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- चंद्रशेखरन ने अगस्त में कार्यकाल क्यों छोड़ा था?
- अगस्त में बोर्ड में उनकी पुनर्नियुक्ति पर सहमति न बनने के कारण उन्होंने खुद को अलग कर लिया था।
- टाटा ट्रस्ट्स के वीटो अधिकारों में क्या बदलाव आएंगे?
- सूचीबद्धता के बाद टाटा ट्रस्ट के नामित निदेशकों को मिले कई वीटो अधिकार कम या खत्म हो जाएंगे।
- नोएल टाटा चंद्रशेखरन की पुनर्नियुक्ति का विरोध क्यों कर रहे हैं?
- उनका तर्क है कि यह निर्णय ट्रस्ट्स की मंजूरी के खिलाफ और चंद्रशेखरन के हटने के उनके फैसले का उल्लंघन है।
- एक्सपर्ट्स का इस फैसले पर क्या विचार है?
- विशेषज्ञ मानते हैं कि यह निर्णय नियामकों और बाजार के प्रति जवाबदेही बढ़ाएगा और कॉरपोरेट प्रशासन में पारदर्शिता लाएगा।
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