भारत में करोड़ों बच्चे जलवायु संकट के खतरों का सामना कर रहे हैं
विशेषज्ञों ने कहा कि समाधान के लिए एक विषय से परे सोच जरूरी है
नई दिल्ली में आयोजित 8वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन 2026 के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि भारतीय बच्चे गर्मी, बाढ़ और पानी की कमी जैसी जलवायु संबंधी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। इस सम्मेलन में पर्यावरण शिक्षा को जागरूकता से आगे ले जाकर कार्रवाई से जोड़ने पर जोर दिया गया और बच्चों को सुरक्षित वातावरण, पानी और सुविधाओं की उपलब्धता पर ध्यान देने की बात कही गई।
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नई दिल्ली। नई दिल्ली में 8वें इंटरनेशनल कॉन्फ्रेंस ऑन सस्टेनेबिलिटी एजुकेशन 2026 के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि भारत में करोड़ों बच्चे गर्मी, बाढ़ और पानी की कमी जैसे खतरों का सामना कर रहे हैं।
सम्मेलन में ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. राधिका खोसला ने कहा कि जलवायु और सस्टेनेबिलिटी से जुड़े सवालों को किसी एक विषय के नजरिए से समझना या हल करना मुमकिन नहीं है। कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के प्रो. भास्कर वीरा ने बताया कि पर्यावरण शिक्षा में न तो लोगों को डराने की जरूरत है और न ही यह मान लेने की कि केवल तकनीक हर समस्या हल कर देगी।
सीईओ प्रियंका शर्मा ने कहा कि सस्टेनेबिलिटी को अब सिर्फ पर्यावरण से जोड़कर देखने का समय बीत चुका है। निदेशक कार्तिकेय साराभाई ने बताया कि पर्यावरण शिक्षा का अगला चरण सिर्फ जागरूकता पैदा करना नहीं, बल्कि लोगों को कार्रवाई के लिए तैयार करना है।
सीनेटर सुनीता नारायण ने जलवायु परिवर्तन को लेकर गंभीर चेतावनी दी। उन्होंने नेपाल में हाल की त्रासदी का जिक्र करते हुए कहा कि अब जलवायु परिवर्तन को नकारना वास्तविकता से आंखें मूंदने जैसा है। हिमालयी इलाकों में लगातार हो रहे निर्माण, सड़कें और हाइड्रोपावर परियोजनाएं पर्यावरण पर बड़ा दबाव डाल रही हैं। इंसानों को यह सोच बदलनी होगी कि पहाड़ों और नदियों को अपनी सुविधा के हिसाब से बदला जा सकता है।
उन्होंने दिल्ली के प्रदूषण पर भी बात की और कहा कि असली जरूरत ऐसी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था खड़ी करने की है जिससे लोगों को हर छोटी-बड़ी जरूरत के लिए कार निकालने की मजबूरी न हो। यमुना नदी में दिल्ली में प्रवेश के समय घुली ऑक्सीजन का स्तर करीब 6 है, जो ISBT तक पहुंचते-पहुंचते शून्य हो जाता है।
TERI की महानिदेशक डॉ. विभा धवन ने बताया कि पिछली पीढ़ी ने प्राकृतिक संसाधनों का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल किया और अब उसका असर युवाओं को झेलना पड़ रहा है। उन्होंने रोजमर्रा की बदलती आदतों जैसे बोतलबंद पानी और निजी गाड़ियों के बढ़ते इस्तेमाल को पर्यावरण से जुड़ा बड़ा सवाल बताया।
UNICEF के Bo Beiskjaer ने बच्चों पर जलवायु संकट के असर की ओर ध्यान दिलाया। उन्होंने कहा कि बच्चों को सुरक्षित स्कूल, पर्याप्त पानी और जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना अब पहले से ज्यादा जरूरी है। युवाओं को ऐसी शिक्षा देनी होगी जिससे वे भविष्य के फैसलों में अपनी भूमिका निभा सकें।
सम्मेलन में ग्रीन जॉब्स, क्रिटिकल मिनरल्स, ई-वेस्ट, बैटरी रीसाइक्लिंग और टिकाऊ कृषि जैसे मुद्दों को भी चर्चा के केंद्र में रखा गया। विशेषज्ञों ने कहा कि पर्यावरण शिक्षा को सिर्फ किताबों और जागरूकता अभियानों तक सीमित रखने का समय खत्म हो चुका है। अब इसे सीधे कार्रवाई से जोड़ना होगा।
पर्यावरण शिक्षा का मतलब केवल किताबों में जानकारी देना नहीं होना चाहिए
कार्तिकेय साराभाई, निदेशक
जलवायु संकट का समाधान किसी एक विषय से नहीं निकलेगा
प्रो. राधिका खोसला
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- जलवायु संकट को हल करने के लिए क्या आवश्यक है?
- जलवायु संकट को हल करने के लिए विभिन्न विषयों का समेकित दृष्टिकोण आवश्यक है।
- पर्यावरण शिक्षा के अगले चरण में क्या शामिल है?
- पर्यावरण शिक्षा के अगले चरण में न केवल जागरूकता बल्कि लोगों को कार्रवाई के लिए तैयार करना शामिल है।
- हिमालयी क्षेत्रों में क्या समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं?
- हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक निर्माण और हाइड्रोपावर परियोजनाएं पर्यावरण पर दबाव डाल रही हैं।
- दिल्ली के प्रदूषण के समाधान के लिए क्या सुझाव दिया गया?
- दिल्ली के प्रदूषण के समाधान के लिए एक प्रभावी सार्वजनिक परिवहन प्रणाली की आवश्यकता बताई गई।
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