सुप्रीम कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत दोषी की धारणा को खारिज किया
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि POCSO एक्ट में दोषी होने की कानूनी धारणा पक्की नहीं होती
सुप्रीम कोर्ट ने POCSO एक्ट के तहत दोषी ठहराए गए आरोपी को सबूतों की कमी और जांच में विरोधाभास के कारण बरी कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है। यह फैसला POCSO एक्ट की धाराओं के तहत दोषी ठहराने की कानूनी धारणा को पूरी तरह पक्की नहीं माना गया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012 के तहत दोषी ठहराए गए आरोपी को बरी कर दिया है।
सुप्रीम कोर्ट का तर्क
कोर्ट ने इस मामले में डॉक्टर के सबूत और फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट को मिलाकर देखने पर किसी भी तरह की अंदरूनी हरकत की संभावना पूरी तरह से खारिज कर दी।
सुप्रीम कोर्ट ने 'स्टेट ऑफ़ यूपी बनाम बाबूलाल नाथ' के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा।
मामले का विवरण
आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 363 और POCSO एक्ट की धारा 6 के तहत दोषी ठहराया गया था। उसे POCSO एक्ट के तहत दस साल की कठोर कैद और जुर्माने की सजा सुनाई गई थी, साथ ही धारा 363 के तहत एक साल की कठोर कैद भी दी गई।
दिल्ली हाईकोर्ट में अपील दायर की गई थी, जिसमें आरोपी की दोषसिद्धि और सजा बरकरार रखी गई। आरोप था कि शिकायतकर्ता की ढाई साल की बच्ची झुग्गी के पास खेलते समय गायब हो गई थी। बाद में पता चला कि आरोपी उसे पास के एक पार्क में ले गया था। घर लौटने पर बच्चे के कपड़ों पर खून देखा गया था और उसने आरोपी का नाम लिया था।
IPC की धारा 363, 376 और 506 तथा POCSO एक्ट की धारा 4 और 5 के तहत चार्जशीट दायर की गई थी। जांच में शिकायतकर्ता और प्राइवेट डॉक्टर के बयानों में विरोधाभास मिले। एम्स में बच्चे की जांच करने वाले डॉक्टर ने बच्चे के वल्वा वाले हिस्से पर कोई चोट या खून के धब्बे नहीं पाए और हाइमन को सुरक्षित बताया।
सामाजिक बहिष्कार और जीवन
निठारी कांड के आरोपी सुरेंद्र कोली को सुप्रीम कोर्ट ने सुबूतों के अभाव में बरी कर दिया था, लेकिन वह सामाजिक बहिष्कार झेल रहे थे। वह हरिद्वार में रहते थे और दो महीने पहले भूपतवाला क्षेत्र में चाय का खोखा किराए पर लिया था।
स्थानीय निवासियों ने बताया कि सुरेंद्र का व्यवहार सामान्य था और उन्होंने पुलिस को बताया कि सुरेंद्र ने सिडकुल क्षेत्र में चाय की ठेली लगाने के दौरान किराए पर कमरा लिया था। खोखे के मालिक राजीव ने पुलिस को बताया कि उसे सुरेंद्र की सही पहचान नहीं थी और सुरेंद्र ने अपना नाम सुरेंद्र और अल्मोड़ा का पता बताया था। सुरेंद्र की आत्महत्या के बाद आसपास के लोग दंग रह गए।
POCSO Act की धारा 29 और 30 के तहत दोषी होने की कानूनी धारणा पक्की (Absolute) नहीं है, और एक बार जब आरोपी सफलतापूर्वक विसंगतियों और सबूतों के समर्थन की कमी (Non-Corroboration) को उजागर कर देता है, तो दोषी होने की धारणा प्रभावी नहीं रह जाती।
सुप्रीम कोर्ट
इस विसंगति को मामूली या महत्वहीन नहीं माना जा सकता, खासकर तब जब इसे मामले के तथ्यों और अन्य सबूतों के साथ देखा जाए।
सुप्रीम कोर्ट
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- क्या अब आरोपी को फिर से जांच या सजा मिल सकती है?
- सुप्रीम कोर्ट के बरी करने के बाद मामले में पुनः जांच या सजा मिलने की संभावना काफी कम हो जाती है, जब तक कि नई मजबूत साक्ष्य न मिलें।
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