बाढ़ में फंसे घर में जन्मीं जुड़वा बेटियां गंगा और जमुना
बिलग्राम तहसील के मजदूर परिवार में 11 सदस्यों के बीच खुशियां और चिंता
उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के बाढ़ प्रभावित राइजिंगपुरवा गांव में एक मजदूर परिवार में जुड़वा बेटियों का जन्म हुआ है। परिवार की झोपड़ी बाढ़ में गिर चुकी है और नवजात बच्चियों व मां की देखभाल को लेकर चिंता बनी हुई है, वहीं इलाके में जलजमाव और खेती की नुकसान की स्थिति बनी हुई है।
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हरदोई। उत्तर प्रदेश के हरदोई जिले के बिलग्राम तहसील के राइजिंगपुरवा गांव में बाढ़ के बीच एक मजदूर परिवार में जुड़वा बेटियों का जन्म हुआ। परिवार में पहले से सात बेटियां और तीन बेटे हैं, जिससे कुल सदस्य संख्या 11 हो गई है।
महेंद्र ने बताया कि उनकी पत्नी रिंकी देवी को प्रसव पीड़ा शुरू हुई, लेकिन बाढ़ के कारण अस्पताल पहुंचाना आसान नहीं था। किसी तरह उन्हें बिलग्राम सीएचसी ले जाया गया, जहां रिंकी ने जुड़वा बेटियों को जन्म दिया। परिवार ने बेटियों का नाम गंगा और जमुना रखा है क्योंकि वे गंगा के किनारे बसे गांव में पैदा हुई हैं।
परिवार में कुल 11 सदस्य हैं, जिनमें पहले से सात बेटियां और तीन बेटे शामिल हैं। जुड़वा बेटियों के जन्म के बाद बच्चों की संख्या नौ हो गई है। महेंद्र मजदूरी करते हैं और सीमित आमदनी में इतने बड़े परिवार की जरूरतें पूरी करना उनके लिए बड़ी चुनौती है।
परिवार की झोपड़ी पहले ही बाढ़ में गिर चुकी है और चारों तरफ पानी भरा हुआ है। नवजात बच्चियों और मां की देखभाल को लेकर परिवार की चिंता बनी हुई है।
सवायजपुर, हरपालपुर और बिलग्राम क्षेत्र के कई गांवों में बाढ़ की वजह से मुश्किलें बढ़ी हैं। कई गांव पानी से घिरे हैं और लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए भी परेशानी उठानी पड़ रही है।
गंगा-कोसी का जलस्तर घटा है और बाढ़ का पानी धीरे-धीरे उतर रहा है, लेकिन जलजमाव और दलदल की समस्या बनी हुई है। खेतों में पानी भरा होने से खरीफ फसलें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं।
प्रखंडवार स्थिति पर नजर डालें तो नाथनगर प्रखंड के ग्रामीण इलाकों में मुख्य सड़कों से पानी उतर चुका है, जिससे आवागमन धीरे-धीरे बहाल हो रहा है। इसके विपरीत दियारा इलाके की बस्तियों में जलजमाव की स्थिति बनी हुई है।
स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, दियारा के घरों से पानी और कीचड़ सूखने में कम से कम 15 से 20 दिन लगेंगे। कई विस्थापित परिवार अभी भी बांधों और ऊंची सड़कों पर शरण लिए हुए हैं। निचले टोले-मोहल्लों में लोग मवेशियों के साथ खुले आसमान या तंबुओं के नीचे दिन काट रहे हैं।
अजगैवीनाथ धाम प्रखंड क्षेत्र में गंगा के जलस्तर में कमी आई है, लेकिन कई पंचायतों के निचले इलाकों में स्थिति सामान्य नहीं हो सकी है। कई मोहल्लों तक पहुंचने वाले संपर्क पथ जलमग्न हैं, जिससे लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों के लिए जोखिम उठाना पड़ रहा है।
प्रभावित परिवारों के सामने शुद्ध पेयजल, राशन, बच्चों का दूध और दैनिक आवश्यकताओं का संकट बना हुआ है। ग्रामीणों का कहना है कि जब तक पूरे इलाके से पानी नहीं निकल जाता, उनकी परेशानियां खत्म नहीं होंगी।
कहलगांव प्रखंड के अधिकांश गांवों से बाढ़ का पानी उतर चुका है, लेकिन तोफिल और अनठावन गांव अभी भी जलभराव की चपेट में हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- महेंद्र परिवार की हालात क्या है?
- महेंद्र मजदूरी करते हैं और सीमित आमदनी के बावजूद इतने बड़े परिवार की देखभाल में मुश्किल का सामना कर रहे हैं।
- जलजमाव और बाढ़ ने खेती पर क्या असर डाला है?
- खेतों में पानी भरा होने से खरीफ फसलें पूरी तरह नष्ट हो गई हैं।
- स्थानीय लोगों की बाढ़ से सुरक्षा स्थिति कैसी है?
- कई विस्थापित परिवार अभी भी बांधों और ऊंची सड़कों पर शरण लिए हुए हैं और निचले टोले-मोहल्लों के लोग खुले आसमान या तंबुओं के नीचे दिन बिता रहे हैं।
- जलस्तर घटने के बाद भी किन क्षेत्रों में समस्या बनी हुई है?
- अजगैवीनाथ धाम प्रखंड के कई पंचायतों के निचले इलाके अभी भी जलमग्न हैं, जिससे आवागमन और दैनिक आवश्यकताओं में दिक्कतें हैं।
- बाढ़ प्रभावित इलाकों में पानी सूखने में कितना समय लगेगा?
- स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार, दियारा के घरों से पानी और कीचड़ सूखने में कम से कम 15 से 20 दिन लगेंगे।
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