इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सहायक अध्यापक की बर्खास्तगी का आदेश रद्द किया
फर्जी प्रमाणपत्र पर पुरानी नियुक्ति रद्द होना सेवा से बर्खास्तगी नहीं माना जाएगा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संतकबीर नगर के सहायक अध्यापक अनिल कुमार की बर्खास्तगी का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि पिछले फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर पिछली नियुक्ति रद्द होने के कारण वर्तमान सेवा समाप्त करना उचित नहीं है, क्योंकि वर्तमान नियुक्ति वैध प्रमाणपत्रों पर आधारित थी।
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इलाहाबाद हाई कोर्ट ने संतकबीर नगर के सहायक अध्यापक अनिल कुमार की सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर पिछली नियुक्ति रद्द होना सेवा से बर्खास्तगी नहीं माना जा सकता।
अनिल कुमार ने 24 सितंबर 2015 को सहायक अध्यापक के पद पर कार्यभार ग्रहण किया था। नियुक्ति के दौरान उसके शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन किया गया था और एक वर्ष बाद उसकी सेवा स्थायी कर दी गई थी। वर्ष 2018 में उसके खिलाफ शिकायत आई कि उसने फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्ति हासिल की है। जांच में हाईस्कूल, इंटरमीडिएट और बीएससी के प्रमाणपत्र सही पाए गए, जबकि बीएड मार्कशीट के सत्यापन की रिपोर्ट लंबित थी। इसके बावजूद जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी ने 20 अप्रैल 2019 को उसकी सेवाएं समाप्त कर दी थीं।
याची ने कोर्ट को बताया कि वर्ष 2004 में उसकी एक अन्य नियुक्ति हुई थी, जिसे बाद में बीएड प्रमाणपत्र फर्जी पाए जाने के कारण रद्द कर दिया गया था। हालांकि वर्ष 2015 की नियुक्ति अलग चयन प्रक्रिया के तहत हुई थी। कोर्ट ने कहा कि नियम 11 के तहत अयोग्यता उस व्यक्ति पर लागू होती है जिसे राज्य सरकार ने सेवा से बर्खास्त किया हो। पिछली नियुक्ति को फर्जी प्रमाणपत्र के आधार पर रद्द करना सेवा से बर्खास्तगी नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि वर्तमान नियुक्ति के लिए वास्तविक और वैध शैक्षिक प्रमाणपत्रों का इस्तेमाल किया गया था, तो केवल पिछली नियुक्ति रद्द होने की जानकारी न देने के आधार पर वर्तमान नियुक्ति समाप्त नहीं की जा सकती। किसी तथ्य को छिपाने का आरोप तभी लगाया जा सकता है, जब संबंधित अभ्यर्थी से उस तथ्य की जानकारी आवेदन पत्र, घोषणा पत्र या नियमों के तहत स्पष्ट रूप से मांगी गई हो।
कोर्ट ने पाया कि याची की मौजूदा नियुक्ति वास्तविक शैक्षिक योग्यता और वैध प्रमाणपत्रों के आधार पर हुई थी। पिछली नियुक्ति में इस्तेमाल किए गए प्रमाणपत्र की वर्तमान नियुक्ति में कोई भूमिका नहीं थी। इसलिए पिछली नियुक्ति रद्द होने की जानकारी न देने और वर्तमान नियुक्ति के बीच कोई सीधा संबंध स्थापित नहीं हुआ।
न्यायमूर्ति मंजूरानी चौहान ने अनिल कुमार की याचिका स्वीकार करते हुए उसकी बर्खास्तगी का 20 अप्रैल 2019 का आदेश निरस्त कर दिया। कोर्ट ने कहा कि यदि वर्तमान नियुक्ति समाप्त करने के लिए जानबूझकर तथ्य छिपाने को कदाचार माना जा रहा है, तो प्राधिकारी नियुक्ति रद्द करने की आड़ में विभागीय जांच की निर्धारित प्रक्रिया से बच नहीं सकता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- क्या अनिल कुमार की वर्तमान नियुक्ति वैध थी?
- कोर्ट ने पाया कि अनिल कुमार की वर्तमान नियुक्ति वास्तविक और वैध प्रमाणपत्रों पर आधारित थी।
- क्या किसी तथ्य को छिपाने का आरोप तब ही लगाया जा सकता है?
- यह तभी संभव है जब उस तथ्य की जानकारी आवेदन पत्र या नियमों के तहत स्पष्ट रूप से मांगी गई हो।
- अनिल कुमार की पिछली नियुक्ति कितनी महत्वपूर्ण थी इस मामले में?
- पिछली नियुक्ति और उसके प्रमाणपत्र की समस्या वर्तमान नियुक्ति में कोई भूमिका नहीं रखती।
- क्या विभागीय जांच की प्रक्रिया से बचा जा सकता है?
- कोर्ट ने कहा कि नियुक्ति रद्द करने की आड़ में विभागीय जांच की प्रक्रिया से बचा नहीं जा सकता।
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