कोल कंपनियों के नियमों में संशोधन से अविवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार
संशोधन 11 जून 2024 से लागू, अदालत ने अविवाहित बहन को आश्रित मानने का आदेश दिया
झारखंड हाई कोर्ट ने कोल कंपनियों के नियमों में हुए संशोधन के बाद अविवाहित बहन को आश्रित की श्रेणी में शामिल करने और अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार देने का आदेश दिया है। अदालत ने संविदा पर लंबे समय से कार्यरत कर्मचारियों को नियमित करने और संबंधित लाभ देने का भी निर्देश दिया है। इसके अलावा, हाई कोर्ट ने इंदौर की एक संपत्ति विवाद में बेदखली पर रोक लगाई और मामले की पुनः जांच का आदेश दिया।
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झारखंड हाई कोर्ट ने कोल कंपनियों के नियमों में संशोधन के बाद अविवाहित बहन को आश्रित की श्रेणी में शामिल करने का आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि पद स्वीकृत न होने का आधार नियुक्ति से इंकार करने के लिए मान्य नहीं होगा। यह संशोधन 11 जून 2024 से प्रभावी हुआ है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि संशोधन के बाद यदि निर्धारित अवधि के भीतर अनुकंपा नियुक्ति के लिए आवेदन किया गया है, तो केवल इस आधार पर नियुक्ति से इंकार नहीं किया जा सकता कि कर्मचारी का निधन संशोधन से पहले हुआ था। अदालत ने कहा, "कोल कंपनियों के प्रविधान में संशोधन के बाद अविवाहित बहन को भी आश्रित की श्रेणी में शामिल किया गया है।"
झारखंड हाई कोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के इंजीनियरिंग सेल में वर्षों से संविदा पर काम कर रहे नौ कर्मचारियों को नियमित करने का आदेश दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने 14 अगस्त 2024 के विभागीय आदेश को रद्द करते हुए कहा कि संविदा पर 10 वर्ष से अधिक समय तक काम करने वाले कर्मचारियों को केवल संविदा कर्मी होने के आधार पर हटाना अनुचित है। अदालत ने विभाग को छह हफ्ते के भीतर सभी नौ याचिकाकर्ताओं को सेवा में बहाल कर औपचारिक नियमितीकरण पूरा करने का निर्देश दिया।
झारखंड ऊर्जा विकास निगम लिमिटेड में लंबे समय से संविदा पर कार्यरत चालकों को भी हाई कोर्ट ने नियमित करने और संबंधित लाभ देने का आदेश दिया है। जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने करीब 15 वर्षों से लगातार सेवा दे रहे चालकों को नियमित करने का निर्देश दिया।
इंदौर की खजराना स्थित भूमि से संबंधित बेदखली मामले में हाई कोर्ट की इंदौर पीठ ने अपना पूर्व आदेश वापस लेते हुए पुनर्विचार याचिका स्वीकार की है। अदालत ने याचिकाकर्ता की बेदखली पर रोक लगाई और संदिग्ध प्रक्रियाओं पर कड़े सवाल उठाए। जस्टिस मिलिंद फड़के की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि जिस आदेश के आधार पर संपत्ति से कब्जा हटाने की कार्रवाई की जा रही थी, वह मूल याचिका में प्रस्तुत नहीं किया गया था।
कोर्ट ने कहा कि 20 अप्रैल 2026 के कथित आदेश की वैधता एक बुनियादी सवाल है। पुलिस आयुक्त को दी गई शिकायत में अपर आयुक्त पर फर्जी आदेश तैयार करने और दुरुपयोग करने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। अदालत ने कहा कि जालसाजी का अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसी की निष्पक्ष और वैज्ञानिक पड़ताल से ही सामने आएगा।
अदालत ने यह भी कहा कि संपत्ति बिक जाने भर से किराएदारों को हटाने का आधार नहीं बनता। यह फैसला झारखंड हाई कोर्ट की जस्टिस दीपक रोशन की अदालत ने दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- अविश्वास बहन को आश्रित श्रेणी में शामिल करने का क्या महत्व है?
- इससे अविवाहित बहन को अनुकंपा नियुक्ति का अधिकार मिलेगा, जो पहले कोल कंपनियों के नियमों में नहीं था।
- संविदा कर्मचारियों को नियमित करने का न्यायालय ने क्या कारण दिया?
- अदालत ने कहा कि लंबे समय तक सेवा देने वाले संविदा कर्मचारी केवल संविदा के आधार पर हटाए नहीं जा सकते हैं।
- इंदौर भूमि बेदखली मामले में कोर्ट ने किस आधार पर पुनर्विचार याचिका स्वीकार की?
- कोर्ट ने पाया कि जबरन बेदखली के आदेश मूल याचिका में प्रस्तुत नहीं थे और प्रक्रिया संदिग्ध थी।
- कोर्ट ने झारखंड ऊर्जा विकास निगम के चालकों के बारे में क्या निर्णय लिया?
- करीब 15 वर्षों से सेवा दे रहे चालकों को नियमित करने और लाभ देने का निर्देश दिया।
- झारखंड हाई कोर्ट ने पुलिस पर क्या आरोपों का उल्लेख किया?
- अपर आयुक्त पर फर्जी आदेश बनाने और दुरुपयोग के गंभीर आरोप लगाए गए हैं, जो जांच एजेंसी द्वारा जांचे जाएंगे।
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