जयपुर में ‘समुद्र मंथन’ नाटक ने उठाए विकास के विषैले पहलू
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की प्रस्तुति में पौराणिक कथा से पर्यावरण संकट पर सवाल
जयपुर के महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की कंपनी ने ‘समुद्र मंथन’ नाटक प्रस्तुत किया, जिसमें पौराणिक कथा के जरिए आधुनिक विकास के पर्यावरणीय दुष्परिणामों पर सवाल उठाए गए। नाटक में प्रदूषण और असंतुलन को ‘विष’ के रूप में दिखाया गया और आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी पर विचार किया गया।
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जयपुर। जयपुर के महात्मा गांधी यूनिवर्सिटी ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड टेक्नोलॉजी में रविवार को ‘समुद्र मंथन’ नाटक की प्रस्तुति हुई। नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की रेपर्टरी कंपनी द्वारा प्रस्तुत इस नाटक में पौराणिक कथा के माध्यम से आधुनिक समाज के पर्यावरणीय संकट और विकास के दुष्परिणामों पर सवाल उठाए गए।
‘समुद्र मंथन’ नाटक की मूल कथा पौराणिक समुद्र मंथन की अवधारणा पर आधारित है, जिसमें देवताओं और असुरों ने अमृत की खोज में क्षीर सागर का मंथन किया था। मंथन के दौरान हलाहल विष निकला, जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण कर सृष्टि को विनाश से बचाया। नाटक इसी कथा को आज के संदर्भ में आगे बढ़ाता है और विकास, विज्ञान, तकनीक तथा समृद्धि के साथ उत्पन्न प्रदूषण, असंतुलन और पर्यावरणीय संकट को ‘विष’ के रूप में दर्शाता है।
मंच पर देव और असुर केवल पौराणिक पात्र नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर की सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं। नाटक दर्शकों से पूछता है कि क्या मनुष्य अपने भीतर के देवत्व और आसुरी प्रवृत्तियों को पहचान पा रहा है। इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और कमजोरियों से भरे मनुष्य के भीतर भी एक तरह का ‘मंथन’ चलता रहता है।
नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की इस प्रस्तुति में 100 से अधिक कलाकार शामिल थे। भव्य मंच सज्जा, दृश्य वैभव, संगीत, नृत्य और आधुनिक रंग-तकनीक के माध्यम से समुद्र मंथन की कथा को जीवंत किया गया। संगीत और नृत्य ने भावनात्मक पक्ष को मजबूती दी, जबकि मंच सज्जा ने विशाल कथा को प्रभावशाली रूप से प्रस्तुत किया।
नाटक का संदेश आज के समय में विशेष रूप से प्रासंगिक है। आधुनिक विकास ने जीवन को सुविधाजनक बनाया है, लेकिन इसके साथ पर्यावरण प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक खतरों जैसी चुनौतियां भी आई हैं। यह प्रस्तुति दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती है कि विकास की दौड़ में हम इसके दुष्परिणामों पर कितना ध्यान दे रहे हैं।
आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी किसकी है और विकास तथा प्रकृति के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, ये सवाल नाटक सीधे दर्शकों के सामने रखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- समुद्र मंथन नाटक की पौराणिक कथा का क्या महत्व है?
- यह कथा देवताओं और असुरों द्वारा अमृत की खोज में क्षीर सागर मंथन पर आधारित है, जिसमें विष हलाहल सृष्टि को विनाश से बचाता है।
- नाटक में देव और असुर किसका प्रतीक हैं?
- वे मनुष्य के भीतर की सकारात्मक और नकारात्मक प्रवृत्तियों का प्रतीक हैं।
- नाटक का मुख्य संदेश क्या है?
- विकास के साथ उत्पन्न पर्यावरणीय संकटों पर ध्यान देने और संतुलन बनाने की जरूरत पर जोर देता है।
- कैसे नाटक ने आधुनिक रंग-तकनीक का प्रयोग किया?
- मंच सज्जा और दृश्य प्रभावों के माध्यम से कथा को प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया गया।
- नाटक के जरिए कौन से पर्यावरणीय मुद्दे उठाए गए हैं?
- पर्यावरण प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और रासायनिक खतरों को ‘विष’ के रूप में दर्शाया गया है।
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