मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने FIR की मांग खारिज की
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में मृतक का बयान निर्णायक मृत्युपूर्व बयान नहीं माना
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने लॉकडाउन के दौरान पुलिस द्वारा मारपीट के मामले में मृतक के कथित इलेक्ट्रॉनिक मीडिया बयान को मृत्युपूर्व बयान नहीं माना और FIR दर्ज कराने की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने और धारा 200 व 202 के तहत कार्रवाई का विकल्प दिया है।
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मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने मृतक का कथित बयान मृत्युपूर्व बयान नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर कोर्ट ने पुलिसकर्मियों के खिलाफ FIR दर्ज कराने की याचिका को खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने की अनुमति दी गई है।
याचिकाकर्ता पूनम कुशवाहा ने आरोप लगाया था कि 16 अप्रैल 2020 को लॉकडाउन के दौरान जबलपुर के गोराबाजार थाने में उनके पति बंशीलाल कुशवाहा के साथ एक पुलिस अधिकारी ने मारपीट की। इसके चार दिन बाद 20 अप्रैल को बंशीलाल की मौत हो गई। पूनम का दावा था कि मौत से पहले बंशीलाल ने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने उस पुलिस अधिकारी का नाम लिया था।
याचिका में फोटो, समाचार पत्रों की कतरनें, मर्ग से संबंधित दस्तावेज और 50 हजार रुपये की अनुग्रह राशि दिए जाने का उल्लेख भी था। मामले में मजिस्ट्रेट ने मर्ग जांच के दौरान आरोप की पुष्टि न होने के कारण FIR दर्ज करने से इनकार किया था। इसके बाद सत्र अदालत ने भी मजिस्ट्रेट के आदेश को बरकरार रखा।
हाई कोर्ट ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि केवल अनुग्रह राशि दिए जाने से हत्या या पुलिसकर्मी की भूमिका स्वतः सिद्ध नहीं होती। अदालत ने कहा कि कानून के तहत धारा 200 और 202 के अंतर्गत आगे की कार्यवाही का रास्ता खुला है। FIR दर्ज कराने की मांग को अदालत ने स्वीकार नहीं किया, लेकिन याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष कानूनी उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी गई है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
- क्या हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को कोई विकल्प दिया?
- हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ता को मजिस्ट्रेट के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने और कानूनी उपाय अपनाने की अनुमति दी।
- याचिका में कौन-कौन से दस्तावेज शामिल थे?
- याचिका में फोटो, समाचार पत्रों की कटिंग, मर्ग से संबंधित दस्तावेज और अनुग्रह राशि का उल्लेख था।
- मर्ग जांच का क्या निष्कर्ष था?
- मर्ग जांच के दौरान आरोप की पुष्टि नहीं हुई, इसलिए FIR दर्ज करने से मना किया गया।
- क्या अनुग्रह राशि से पुलिसकर्मी की भूमिका सिद्ध होती है?
- अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल अनुग्रह राशि दिए जाने से हत्या या पुलिसकर्मी की भूमिका स्वतः सिद्ध नहीं होती।
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